यहाँ 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 से जुड़े विवाद का विस्तृत विवरण हिंदी में दिया जा रहा है।
📜 नए विनियमों में क्या प्रस्तावित था?
ये नए नियम 2012 के पुराने ढांचे को बदलने के लिए लाए गए थे, ताकि कैंपस में जाति-आधारित भेदभाव, खासकर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग *(OBC) *के खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए एक सख्त प्रणाली बनाई जा सके। मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे:
- . संस्थागत तंत्र: हर उच्च शिक्षण संस्थान में समान अवसर केंद्र और 10 सदस्यीय समिति **(इक्विटी कमेटी**) बनाना अनिवार्य किया गया, जो शिकायतों का निपटारा करेगी।
- निगरानी और रिपोर्टिंग: कैंपस में निगरानी के लिए "इक्विटी स्क्वॉड" (समता दल) गठित करने और घटनाओं की सूचना के लिए *24×7 हेल्पलाइन *शुरू करने का प्रावधान था.
- त्वरित प्रक्रिया: शिकायतों के निपटारे के लिए सख्त समय-सीमा निर्धारित की गई, जैसे कमेटी को 24 घंटे के भीतर बैठक करनी होगी और 15 कार्य दिवसों में रिपोर्ट देनी होगी।
- दंड का प्रावधान: नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों को यूजीसी की योजनाओं से वंचित किया जा सकता था और उनका फंडिंग रोकी जा सकती थी। ###⚖️ मुख्य विवाद का केंद्र: सुरक्षा का दायरा
विवाद की सबसे बड़ी वजह विनियमों की धारा 3(1)(c) थी, जिसमें "जाति-आधारित भेदभाव" *की परिभाषा दी गई थी। इस धारा के अनुसार, *भेदभाव केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ ही माना जाता था।
"
- सुरक्षा का पदानुक्रम": इस परिभाषा ने आरोप लगाया कि इससे सुरक्षा का एक "*पदानुक्रम" (हायरार्की) *बन गया है। इसका मतलब यह हुआ कि सामान्य वर्ग के छात्र, यदि उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो वे इस विशेष कानूनी ढांचे के तहत राहत नहीं मांग सकते थे।
- याचिकाकर्ताओं का तर्क: याचिकाकर्ताओं, जिनमें विनीत जिंदल ने जनहित याचिका दायर की थी, ने इसे असंवैधानिक बताया। उनका कहना था कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), **15 (भेदभाव का निषेध) और 21 (जीवन के अधिकार) **का उल्लंघन है।
-
झूठी शिकायतों पर प्रावधान: यह भी मुद्दा उठा कि मसौदे में झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान था, लेकिन अंतिम अधिसूचना में उसे हटा दिया गया। आलोचकों को आशंका थी कि इससे नियमों के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया है।
📢 देशव्यापी विरोध और राजनीतिक बवाल
इन नियमों के खिलाफ देशभर में, खासकर सामान्य वर्ग के छात्रों और यहां तक कि सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर भी, व्यापक विरोध हुआ।
छात्र विरोध प्रदर्शन: दिल्ली में यूजीसी कार्यालय के बाहर और लखनऊ के विश्वविद्यालयों में छात्रों ने प्रदर्शन किए। दिल्ली विश्वविद्यालय के पीएचडी स्कॉलर अलोकित त्रिपाठी ने इसे "कठोर" बताते हुए कहा कि इससे आरोपी पर सबूत का भार डाल दिया गया है और इक्विटी स्क्वॉड की वजह से कैंपस में रहना "निरंतर निगरानी में जीने" जैसा हो जाएगा।
राजनीतिक इस्तीफे: उत्तर प्रदेश में भाजपा के कम से कम 11 नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। इनमें एक मंडल अध्यक्ष भी शामिल थे। उन्होंने यूजीसी के नए नियमों को "काला कानून" बताया, जो समाज में विभाजनकारी है।
-
बिहार विधानसभा में हंगामा: 20 फरवरी को बिहार विधानसभा में यह मुद्दा उठा, जहां एक माकपा विधायक की टिप्पणी को स्पीकर ने रिकॉर्ड से हटा दिया, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जमकर नोकझोंक हुई।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और रोक
इस विवाद पर सबसे बड़ी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट ने की। 29 जनवरी 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई की।
- अंतरिम रोक (इंटरिम स्टे): अदालत ने 2026 के नए विनियमों पर रोक लगा दी और कहा कि अगले आदेश तक 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे।
- अदालत की टिप्पणी: पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये नियम प्रथमदृष्ट्या "अस्पष्ट" (वेग) हैं और इनके "दुरुपयोग" की संभावना है। अदालत ने यह भी आशंका जताई कि इस तरह के प्रावधानों से छात्रों का "अलगाव" (सेग्रिगेशन) हो सकता है और सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है, जो एक जातिविहीन समाज के लक्ष्य के लिए खतरनाक है।
विशेषज्ञ समिति: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह इन नियमों की फिर से समीक्षा के लिए विशेषज्ञों और न्यायविदों की एक समिति बनाए।
💬 विशेषज्ञों और अधिकारियों की अलग-अलग राय
इस मुद्दे पर जहां सरकार अपना बचाव कर रही थी, वहीं कई विशेषज्ञों ने अदालत के फैसले पर सवाल भी उठाए।सरकार का बचाव: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वासन दिया कि सरकार कानून का दुरुपयोग नहीं होने देगी और सभी कार्य संवैधानिक दायरे में ही होंगे। रोक लगने के बाद सरकार ने प्रमुख प्रावधानों, जैसे झूठी शिकायतों पर दंड के प्रावधान को बहाल करने पर विचार करना शुरू कर दिया।
रोक की आलोचना: यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव थोराट ने अदालत के फैसले से असहमति जताई। उनका तर्क था कि भेदभाव की सामान्य परिभाषा तो सभी पर लागू होती है, लेकिन एससी-एसटी-ओबीसी के लिए अलग प्रावधान इसलिए जरूरी है क्योंकि उनके साथ भेदभाव का स्वरूप अलग होता है। उन्होंने "दुरुपयोग" के तर्क को राजनीति से प्रेरित और तथ्यहीन बताया।
-
जेएनयू वीसी का बयान: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति शांतिश्री धुलीपुड़ी पंडित ने एक पॉडकास्ट में नियमों को "अनावश्यक और तर्कहीन" कहा और टिप्पणी की कि दलित "पीड़ित का कार्ड खेलकर" आगे नहीं बढ़ सकते। इस बयान पर जमकर विवाद हुआ और जेएनयूएसयू ने उनके इस्तीफे की मांग की। हालांकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी बातों को संदर्भ से बाहर निकालकर पेश किया गया।
🔮 आगे की राह
फिलहाल यूजीसी विनियम 2026 पर कानुनी रोक लगी हुई है। यह मामला अब 2019 के एक पुराने मामले (अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत सरकार) से जोड़ दिया गया है, जिसमें छात्रों की आत्महत्या के बाद मजबूत नियमों की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। सरकार को अपना जवाब दाखिल करना है और अदालत द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति प्रावधानों की समीक्षा करेगी। इसका अंतिम परिणाम ही तय करेगा कि देश में कैंपस में भेदभाव रोकने के लिए नए सख्त कानून बनेंगे या पुराना ढांचा ही चलता रहेगा।
Top comments (0)